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योगी और भोगी

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योगी और भोगी के परस्पर विरोधी संस्कार

गीता के दूसरे अध्याय में कृष्ण ने कहा है, ‘जो सभी प्राणियों के लिए रात्रि है, उस समय योगी जागकर अपना काम करता है और जब सभी जागते हैं, वह मुनि के लिए रात्रि है। ऐसा मुनि या योगी ही असली दृष्टा है।’ इसका क्या मतलब हुआ ? प्रभु के कहने के अनुसार संसार में दो प्रकार के मनुष्य हैं ज्यादातर मनुष्य स्वार्थ व अहंभाव लिए भटकते फिरते हैं और मुट्ठी भर मनुष्य ज्ञान का आलोक देखते हैं। यही मोटे तौर पर भोगी व योगी कहे जाते हैं।

प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात यदाकदा हमारी ही तरह गली बाजारों से गुजरते थे, जहां दुकानदार अपनी-अपनी सामग्री बिक्री हेतु सजाए रखते थे। सुकरात कहते थे, ‘मुझे इन सामग्रियों को देखकर आश्चर्य होता है कि इनमें से अधिकांश चीजों के बगैर भी मैं कैसी अच्छी जिंदगी गुजर कर लेता हूं।’ लेकिन हम सब जब परिवार को लेकर मॉल की सैर करते हैं तो सारे सदस्य अपने-अपने मन के अनुसार वस्तुओं को खरीद कर घर लाते हैं।

उनकी पैकिंग खोलकर देखते हैं, दूसरों को दिखाते हैं, फिर संभालकर अलमारियों में रख देते हैं। हमारी रोज की जिंदगी में उनका कोई इस्तेमाल नहीं होता। भले उनकी आवश्यकता हो या नहीं, भले जीवनोपयोगी सारी वस्तुएं घर में पड़ी हों पर औरों को दिखाने व अपने मन को रिझाने के लिए हम नई-नई चीजें बटोरते रहते हैं, हाथ उधर अनायास बढ़ ही जाते हैं। इसी अनावश्यक प्रवृत्ति को भोगवाद कहते हैं, जिसमें दुकानदार के हाथों उल्लू बनकर भी हम फूले नहीं समाते।

आपका बैंक बैलेंस व वार्षिक आय मुकेश अम्बानी या बिल गेट्स को आय के लाखवें या हजारवें हिस्से के बराबर ही क्यों न हो, यदि अपनी लालसाएं संयम में रखकर उस आय में आप संतोष से गुजर कर लें तो आप धनवान, रईस व मालदार हैं। और यदि कोई पचास हजार करोड़ की सम्पत्ति का मालिक होकर भी मन से व्याकुल हो और संग्रह की फिराक में मारा-मारा फिर रहा हो तो शास्त्र उसे निर्धन और अभावग्रस्त की ही संज्ञा देते हैं। अब आप अपनी श्रेणी तय कर लें।

शरीर के स्तर पर योगी (साधक) ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शास्त्रों का मनन चिंतन कर सूर्योदय के समय मंत्रोच्चारण करता हुआ योग-प्राणायाम कर तैयार होता है। उस समय भोगी अपनी शैया छोड़ने के लिए बेड टी लेता है। सुबह से शाम तक उसे 8-10 गोलियां लेनी पड़ती हैं, रात को नींद की गोली अलग हुए दोनों परस्पर उलटे ?

अब मन पर आएं। संसारी व्यक्ति मन के उद्वेग को शांत करने के लिए तरह-तरह के मनोरंजन चाहता है, संपत्ति और सामग्री बटोरता है। अपने भोग विलास के बीच वह यह नहीं समझ पाता कि स्थायी संपत्ति तो हाथ नहीं लग रही। सिगरेट-शराब का आदी व्यक्ति जब तक अपनी खुराक न ले ले, मन बेचैन रहता है। पर उसे लेने पर भी सुख की प्राप्ति नहीं होती, केवल कुछ देर के लिए उद्विग्नता ही मिटती है।

मन सारे संसार से रिश्ते नाते जोड़ता है, यद्यपि वह यह नहीं सोचता कि उन सबको यहीं का यहीं रह जाना है। योगी सबसे प्रेम करता है, पर उसमें किसी भी व्यक्ति या वस्तु के लिए आसक्ति नहीं। भोगी चुने हुओं पर आसक्त रहता है, बाकी के लिए उदासीन।

बुद्धि के स्तर पर योगी जानता है कि शाश्वत ज्ञान के मूल्यों पर चिंतन मनन कर उसे अपने अंदर विवेक के रूप में पैठाना है। वह गहराई में जाता है, भोगियों की तरह नित नूतन उपन्यास व टीवी के सनसनी भरे कार्यक्रमों में नहीं उलझता। उसका विवेक हर क्षण उसे मूल्य-बोध कराता रहता है, भोगी सारा जीवन संचय व भोग में गंवाता है।

जब आंख खुलने की बारी आती है तो बहुत देर हो चुकी होती है। अध्यात्म के क्षेत्र में संसारी यज्ञ-अभिषेक, मनौती चढ़ौती, मक्का मथुरा, व्रत-उपवास कर कर्मकाण्डों को ही धर्म मानता है। योगी संसार को तुच्छ व असार समझ अपने अंदर के अध्यात्म की गहराई में डूबता है। हुए न दोनों उल्टे ? केवल मानव को ही अपने कार्य व दिशा में चुनाव का विवेक मिला है। वरमाला आप ही के हाथ में है, आप जिसे चाहें, उसे वरण करें

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