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आत्मयज्ञ ही मनुष्यता एवं देवत्व का रास्ता है

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यज्ञ और ‘इदं न मम’ की भावना

यजुर्वेद में आत्मयज्ञ को श्रेष्ठ यज्ञ माना गया है। आत्मयज्ञ को सबसे बेहतर मानने के पीछे जो भाव एवं तर्क हैं, वे अत्यन्त व्यावहारिक हैं। हवन करते वक्त हम आहुति देकर कहते हैं- जो सामग्री मैंने हवन कुण्ड में डाली वह मेरी नहीं है, यानी आपके द्वारा दी गई वस्तु आपको पुनः यज्ञ के जरिये सौंप रहा हूं । यह सौंपना ही वेदों में ‘इदं न मम’ की भावना का प्रमाण है। गीता में इसे ‘निष्काम कर्म’ और महाभारत में ‘देव कर्म’ माना गया है। जो इंसान ईश्वर की दी गई धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य और विद्या दूसरों को नहीं सौंपता (बांटता) उसे वेदों में राक्षस कहा गया है। इसीलिए हमें वेद, शास्त्रों एवं महापुरुषों ने केवल कर्म करते जाने की सलाह दी है। जहां सुकर्म में बाधा पैदा होती है, वहां तरह-तरह की समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

आत्मयज्ञ ही मनुष्यता एवं देवत्व का रास्ता है। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि इस आत्मयज्ञ के लिए घर परिवार छोड़ना जरूरी है। यह सोच गलत है और स्वस्थ समाज के निर्माण में बाधा के समान है।

यह पलायनवादी व्याख्या है। शास्त्र कभी ऐसा नहीं कहते। आत्मयज्ञ करने वालों के ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं, जिन्होंने गृहस्थ रहकर भी संतों, महापुरुषों अथवा ऋषियों का-सा जीवन बिताया।

वेद में प्रभु को यज्ञ कहकर पुकारा गया है और उसका बनाया संसार ही यज्ञ रूप है। उसके इस विशाल संसार में हमारे जीवन रूपी यज्ञ की रचना भी उसी ने की है। हमारी काबलियत इसमें है कि सौ वर्षों तक (सौ की उम्र मानकर) चलने वाले इस यज्ञ को कर्त्तव्य के जरिये सफलतापूर्वक करते जाएं। यही आत्मयज्ञ है। इसी से विषय वासनाओं और अहंकार जैसे दुर्गुणों से छुटकारा मिलता है।

महाभारत में कहा गया है, हम दूसरों के साथ ऐसा बर्ताव करें, जैसा हम अपने लिए चाहते हैं। लेकिन अमूमन यह हम कर नहीं पाते। इसकी वजह यह है कि हमारा सही मायनों में आत्मिक विकास नहीं हुआ है और आत्मिक विकास न होने से हमारे अंदर ‘इदं न मम’ की भावना का उदय भी नहीं हुआ है। दुनिया में जितनी भी समस्याएं हैं, वे इस ‘इदं न मम’ की भावना को अमल में नहीं लाने की वजह से ही उत्पन्न होती है।

अपना विचार, अपना घर, अपना विकास, अपना धन, अपना स्वार्थ, अपना ज्ञान यानी ‘ अपना’ या ‘मेरा’ के अलावा हम कुछ सोच ही नहीं पाते। यह ‘अपना’ कितना अपना बन पाता है, यह अंतिम समय आने पर स्पष्ट हो पाता है। इसीलिए वेदों में कहा गया है कि हे ईश्वर! तुम्हारी सृष्टि में ‘मेरा’ कुछ भी नहीं है। मैं तो अकेला आया था। तुम्हारी ही अनुकंपा से मुझे इतना बड़ा संसार और उसके उपभोग के संसाधन मिले। परमात्मा ने उपयोग के लिए जो हमें दिया था, उस पर हमारा एकाधिकार भला कैसे हो सकता है ? इस पर जो विचार करके कर्म करता है, वह कभी न दुख में घबराता है और न सुख में इतराता है।

मानवीय समाज व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए वैदिक ऋषि-मुनियों ने ‘यज्ञ’ और ‘इदं न मम’ का सूत्र दिया। यज्ञ का मतलब केवल हवन में सामग्री डालना नहीं, बल्कि अपने अर्जित को बांट कर उपभोग करने, खाने, पीने और साथ-साथ निर्माण करने का नाम भी है। समाज में वितरण और उपभोग जरूरत के मुताबिक हों। आज दुनिया में जो समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, उनका कारण गैरबराबरी का भाव और हवस भरी जिंदगी ही तो है।

अब यज्ञ का सामाजिक एवं धार्मिक पक्ष देखते हैं। समाज में अशांति, हिंसा, अन्याय, शोषण, जुल्म और असुरक्षा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, क्योंकि हमारा जीवन एकांगी हो गया है। जीवन का उद्देश्य एवं जीने की कला- हम दोनों भूल चुके हैं। हम अपना ज्यादातर वक्त वहां दे देते हैं, जिससे हमारा एवं समाज का कोई वास्तविक भला नहीं होने वाला है। आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो ईश्वर मिलन एवं परमानंद की प्राप्ति का भी सुगम रास्ता आत्मयज्ञ और इदं न मम की भावना ही है। इसे ही अध्यात्म कह लें, स्वस्थ समाज का निर्माण कह लें, अपने स्व का विकास कह लें- बात एक ही है।

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