ज्योतिष

मोती रत्न – चन्द्रमा को बल और मानसिक शांति का सर्वोत्तम उपाय

वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में चन्द्रमा का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। चन्द्रमा के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में चन्द्रमा का बल भिन्न भिन्न होता है जैसे किसी कुंडली में चन्द्रमा बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में चन्द्रमा का बल सामान्य हो सकता है।

किसी कुंडली में चन्द्रमा के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में चन्द्रमा की किसी राशि विशेष में स्थिति ही चन्द्रमा के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है।

विभिन्न कारणों के चलते यदि चन्द्रमा किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में चन्द्रमा उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल चन्द्रमा को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे चन्द्रमा कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार मोती, चन्द्र गृह का प्रतिनिधित्व करता है! कुंडली में यदि चंद्र शुभ प्रभाव में हो तो मोती अवश्य धारण करना चाहिए ! चन्द्र मनुष्य के मन को दर्शाता है, और इसका प्रभाव पूर्णतया हमारी सोच पर पड़ता है! हमारे मन की स्थिरता को कायम रखने में मोती अत्यंत लाभ दायक सिद्ध होता है |

इसके धारण करने से मात्री पक्ष से मधुर सम्बन्ध तथा लाभ प्राप्त होते है! मोती धारण करने से आत्म विश्वास में बढहोतरी भी होती है ! हमारे शरीर में द्रव्य से जुड़े रोग भी मोती धारण करने से कंट्रोल किये जा सकते है जैसे ब्लड प्रशर और मूत्राशय के रोग , लेकिन इसके लिए अनुभवी ज्योतिष की सलाह लेना अति आवशयक है, क्योकि कुंडली में चंद्र अशुभ होने की स्तिथि में मोती नुक्सान दायक भी हो सकता है!

पागलपन जैसी बीमारियाँ भी कुंडली में स्थित अशुभ चंद्र की देंन होती है , इसलिए मोती धारण करने से पूर्व यह जान लेना अति आवशयक है की हमारी कुंडली में चंद्र की स्थिति क्या है! छोटे बच्चो के जीवन से चंद्र का बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है क्योकि नवजात शिशुओ का शुरवाती जीवन , उनकी कुंडली में स्थित शुभ या अशुभ चंद्र पर निर्भर करता है! यदि नवजात शिशुओ की कुंडली में चन्द्र अशुभ प्रभाव में हो तो बालारिष्ठ योग का निर्माण होता है! फलस्वरूप शिशुओ का स्वास्थ्य बार बार खराब होता है, और परेशानिया उत्त्पन्न हो जाती है , इसीलिए कई ज्योतिष और पंडित जी अक्सर छोटे बच्चो के गले में मोती धारण करवाते है I

ज्योतिष और मोती रत्न के लाभ

 मोती चंद्रमा का रत्‍न है इसलिए जिसकी जन्‍मकुंडली में चंद्रमा क्षीण, दुर्बल या पीडि़त हो उन्‍हें मोती अवश्‍य धारण करना चाहिए। निम्‍न परिस्‍थ‍ितियों में इसे ग्रहण करें:

  •  यदि जन्‍मकुंडली में सूर्य के साथ चंद्रमा उपस्थित हो तो वह क्षीण होता है। इसके अलावा सूर्य से अगली पांच राशियों के पहले स्थित होने पर भी चंद्रमा क्षीण होता है। ऐसी स्थिति में मोती धारण करना चाहिए।
  • केंद्र में चंद्रमा हो तो उसे कम प्रभाव वाला या अप्रभावी मानते हैं। ऐसे में केंद्र में चंद्रमा होने पर भी मोती पहनना चाहिए।
  • दूसरे भाव अर्थात धन भाव का स्‍वामी यदि चंद्रमा हो तो यह कुंडली मिथुन लग्‍न में होगी। ऐसे में अगर चंद्रमा छठे भाव में बैठा हो तो मोती धारण करना बहुत उत्‍तम होता है।
  •  जन्‍मकुंडली में अगर चंद्रमा पंचमेश होतर बारहवें भाव में हो या सप्‍तमेश होकर दूसरे भाव में हो, नवमेश होकर चतुर्थ भाव में हो, दशमेश होकर पंचम भाव में हो तथा एकादशेश होकर षष्‍ठम भाव में स्थित हो तो ऐसे व्‍यक्ति को यथाशीघ्र मोती धारण कर लेना चाहिए।
  •  किसी भी कुंडली में अगर चंद्रमा वृश्‍चिक राशि का हो तो इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि वो किस भाव में है। ऐसे जातक को बिना विलंब मोती धारण करना चाहिए।
  •  इसी प्रकार चंद्रमा छठें, आठवें और बारहवें भाव में हो तो भी मोती धारण कर लेना चाहिए।
  •  यदि चंद्रमा राहू, केतु, शनि और मंगल के साथ बैठा हो या इनकी दृष्‍टि चंद्रमा पर हो तो भी मोती धारण करना चंद्रमा के अच्‍छे फल देता है।
  • चंद्रमा जिस भाव का स्‍वामी हो उससे छठे या आठवें स्‍थान में अगर वह स्‍थ‍ित हो तो भी मोती धारण करना चाहिए।
  • अगर चंद्रमा नीच का हो, वक्री हो या अस्‍तगत हो, इसके अलावा चंद्रमा के साथ राहू के ग्रहण योग बना रहा हो तो भी मोती धारण कर लेना चाहिए।
  •  यदि विंशोत्‍तरी पद्धति से चंद्रमा की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो तो ऐसे व्‍यक्‍ति को भी मोती पहन लेना चाहिए।
मोती धारण करने की की विधि
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यदि आप चंद्र देव का रत्न मोती धारण करना चाहते है, तो 5 से 8 कैरेट के मोती को चाँदी की अंगूठी में जड्वाकर किसी भी शुक्लपक्ष के प्रथम सोमवार को सूर्य उदय के पश्चात अंगूठी को दूध, गंगा जल, शक्कर और शहद के घोल में डाल दे! उसके बाद पाच अगरबत्ती चंद्रदेव के नाम जलाये और प्रार्थना करे की हे चन्द्र देव मै आपका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आपका प्रतिनिधि रत्न, मोती धारण कर रहा हूँ , कृपया करके मुझे आशीर्वाद प्रदान करे! तत्पश्चात अंगूठी को निकाल कर ॐ सों सोमाय नम: का 108 बारी जप करते हुए अंगूठी को अगरबत्ती के उपर से घुमाए फिर मंत्र के पश्चात् अंगूठी को शिवजी के चरणों से लगाकर कनिष्टिका  ऊँगली में धारण करे! मोती अपना प्रभाव 4 दिन में देना आरम्भ कर देता है, और लगभग 2 वर्ष तक पूर्ण प्रभाव देता है फिर निष्क्रिय हो जाता है! 2 वर्ष के पश्चात् पुनः नया मोती धारण करे! अच्छे प्रभाव प्राप्त करने के लिए साऊथ सी का 5 से 8 कैरेट का मोती धारण करे! मोती का रंग सफ़ेद और कोई काला दाग नहीं होना चाहिए !

मोती रत्न के गुण:

प्राचीन गाथाओं के अनुसार शुद्ध मोती तारे के जैसे चमकता है। ज्‍योतिष में एकदम गोल मोती को सबसे श्रेष्‍ठ मानते हैं। इसमें न तो कोई रेखा होती हैं और न ही इन पर किसी किए हुए काम के निशान होते हैं। यह ज्ञान को बढ़ाने वाला व धन प्रदान करने वाला रत्‍न है। चंद्रमा का रत्‍न व्‍यक्ति के व्‍यवहार को शांत करता है। निर्बलता को दूर कर चेहरे पर कांति लाता है।

मोती के कुछ गुणों के बारे में चर्चा करें तो मोती का रंग श्वेत रंग से लेकर, हल्के पीले, हल्के नीले अथवा हल्के काले रंग तक हो सकता है तथा संसार के विभिन्न भागों से आने वाले मोती विभिन्न रंगों के हो सकते हैं। यहां पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए मोती के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के पीले रंग का मोती अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को श्वेत रंग का मोती अच्छे फल देता है।

इसलिए मोती के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का मोती धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा मोती लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये मोती के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से मोती का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका मोती आपको हानि भी पहुंचा सकता है।

मोती रत्न का प्रयोग:

मोती को 2, 4, 6 या 11 रत्‍ती का धारण करना चाहिए। इसे चांदी की अंगूठी में धारण करना चाहिए। इसके बाद किसी शुक्‍ल पक्ष के सोमवार को विधिनुसार उपासनादि करके तथा 11000 बार ऊं सों सोमाय: नम: मंत्र जाप करके संध्‍या के समय इसे धारण करना चाहिए।

मोती रत्न का विकल्‍प

मोती की उपलब्‍धता और शुद्ध मोती के बहुत महंगा होने के कारण इसके बदले चंद्रकांत मणि या सफेद पुखराज धारण किया जा सकता है। इस बात का विशेष ध्‍यान रखना चाहिए कि मोती और उसके विकल्‍प के साथ हीरा, पन्‍ना, गोमेद, नीलम और लहसुनिया कभी धारण नहीं करना चाहिए।

सावधानी

मोती क्रय करते समय दो बातों का विशेष ध्‍यान रखना चाहिए पहला कहीं वो नकली न हो और दूसरा मोती पहनने की जो शर्ते हैं उन्‍हें पूरा किया जाए। असली और नकली रत्‍नों की पहचान करना बहुत मुश्‍किल है इसलिए महंगे रत्‍नों को सिर्फ अच्‍छी जगह से लें और उनके सर्टिफिकेट देखकर ही लें।

दूसरी बात की मोती के साथ हीरा, पन्‍ना, नीलम, गोमेद और लहसुनिया न पहनें।

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Abhishek Purohit

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