जानिए हिंदू धर्म में निष्क्रमण संस्कार का महत्त्व

निष्क्रमण संस्कार क्यों किया जाता है?

‘निष्क्रमण’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है बाहर निकालना। शिशु को जब पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है, उस समय संपन्न होने वाला कर्म ‘निष्क्रमण संस्कार’ कहलाता है। इस संस्कार के संबंध में कहा गया है कि…

निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभिः ।

अर्थात् निष्क्रमण संस्कार का फल विद्वानों द्वारा शिशु के स्वास्थ्य और आयु में वृद्धि करने वाला कहा गया है। इस बारे में अथर्ववेद में कहा गया है …

शिवे तेस्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियी, शं ते सूर्य आतप तुशं वातु ते हृदे। शिवा अभिक्षरं त्वापो दिव्याः पयस्वती ॥

अर्थात् हे शिशु ! तुम्हारे निष्क्रमण के समय झुलोक और पृथ्वी लोक सुखद, शोभास्पद और कल्याणकारी हों। सूर्य तुम्हारे लिए कल्याणकारी। प्रकाश प्रदान करें। तुम्हारे हृदय में स्वच्छ कल्याणकारी वायू का संचार हो। दिव्य जल वाली पवित्र गंगा-यमुना आदि नदियां तुम्हारे लिए निर्मल एवं स्वादिष्ट जल वहन करने वाली हों।

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