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जानिए हिंदू धर्म में अन्न प्राशन संस्कार का महत्त्व

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अन्न प्राशन संस्कार क्यों किया जाता है और इसका क्या महत्त्व है ?

अन्नप्राशन संस्कार के बारे में कहा गया है ..

अन्नाशनात्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुध्याति ।

अर्थात् माता के गर्भ में रहने पर शिशु में मलिन भोजन के शुद्धिकरण और शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया ही अन्नप्राशन संस्कार कही जाती है। जब शिशु छ:-सात माह का हो चुका होता है, उस समय तक उसकी पाचन क्रिया प्रबल हो चुकी होती है। इस अवस्था में शिशु जिस प्रकार का अन्न खाना आरंभ करता है, उसी के अनुसार उसका तन-मन बनता है। छांदोग्य उपनिषद् में आया है- आहारशुद्धो-सत्त्वशुद्धिः । अर्थात् शुद्ध आहार के सेवन से शरीर में सत्त्व गुणों की वृद्धि होती है। शास्त्रों के अनुसार अन्नप्राशन संस्कार में शुभ मुहूर्त में जौ और चावल की खीर बनाकर देवताओं को निवेदित करके माता-पिता चांदी की चम्मच से शिशु को चटाते हैं। इसके साथ ही निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण किया जाता है

शिवौ ते स्तां वाहियवावबलासावदोमद्यौ । एतौ यक्ष्मं विवाधेते एतौ मुंचतो अंहसः ॥

अर्थात् हे शिशु! जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक और पुष्टिकारी हों। ये दोनों वस्तुएं यक्ष्मानाशक और देवान्न होने के कारण पापनाशक हैं।

“जैसा अन्न, वैसा मन” की इस उक्ति से संबंधित महाभारत में एक रोचक प्रसंग आता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात पितामह भीष्म शरशैया पर लेटे हुए पांडवों को उपदेश दे रहे थे कि एकाएक उनकी बात के बीच में ही द्रौपदी जोर से हंस पड़ी। द्रौपदी को इस प्रकार हंसते देखकर पितामह को बड़ा आश्चर्य उन्होंने द्रौपदी से इस तरह हंसने का कारण पूछा।

तब द्रौपदी ससम्मान बोली- “पितामह ! आपके उपदेशों में धर्म का गहरा मर्म छुपा हुआ है। आप इस समय बहुत अच्छे धर्मोपदेश दे रहे हैं, किंतु एक पुरानी बात याद आते ही मुझे हंसी आ गई।”

“कौन-सी पुरानी बात ?”

“जब कौरवों की सभा में दुःशासन मुझे अपमानित कर रहा था, उस समय भी आप सभा में थे। उस समय मैंने आपको सहायता के लिए पुकारा था, लेकिन सहायता क्या आपने तो मेरे पक्ष में एक शब्द न बोला था। जबकि मेरा पक्ष धर्म का था। आज जब आप धर्म की चर्चा कर रहे हैं तो उस समय आपका धर्म कहां चला गया था ?”

 द्रौपदी तनिक तेज स्वर में बोली, “बस, यही सोचकर मुझे हंसी आ गई।”

द्रौपदी की बात सुनकर पितामह भीष्म गंभीर हो गए और बोले, “बेटी! उस समय मैं दुर्योधन का अन्न खाता था। उसी अन्न से मेरा रक्त बनता था। कौरवों का, दुर्योधन का जैसा कटु और कुत्सित स्वभाव था, उसका अन्न खाने से मेरे तन-मन पर भी उसका प्रभाव पड़ा। अब अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह सारा अशुद्ध रक्त बहा दिया है। अतः अब मेरा तन और मन पूर्णतया शुद्ध हो गया है। यही कारण है कि अब मैं वही कह रहा हूं, जो धर्म के अनुसार उचित है। “

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